उदयपुर का ऐतिहासिक मटकियों मेला, 300 साल पुरानी मेवाड़ी परंपरा, यहाँ हजारों की संख्या में सजती हैं मटकियां

झीलों की नगरी उदयपुर में हर साल आंवला एकादशी के मौके पर मटकियों का अनोखा मेला आयोजित किया जाता है. इस ऐतिहासिक मेले की शुरुआत महाराणा संग्राम सिंह के समय हुई थी और अब इसे 300 से अधिक वर्ष हो चुके है. माना जाता है कि इस मेले के बाद ही मेवाड़ में गर्मियों की शुरुआत होती है. इस मेले में उदयपुर संभाग के विभिन्न इलाकों से लोग मिट्टी से बनी पारंपरिक वस्तुएं खरीदने के लिए आते हैं.
इनमें मटकियां, हंडिया, दही जमाने के बर्तन, मिट्टी के तवे और बोतलें शामिल हैं. खासतौर पर इन पारंपरिक उत्पादों को गर्मियों में इस्तेमाल करने की परंपरा है, जिससे इनकी मांग काफी ज्यादा रहती है. यहा घरेलू सामान की खरीदारी के लिए गुगूकुंड में दुकानें लगाई गई हैं।
परंपरा और संस्कृति से जुड़ा है मेला
यह मटका मेला मेवाड़ की परंपरा और संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है. आंवला एकादशी के दिन इसे लगाने के पीछे धार्मिक मान्यता भी है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन से गर्मियों की शुरुआत होती है, इसलिए लोग मिट्टी के बर्तनों की खरीदारी कर घरों में उनका उपयोग शुरू करते हैं. यह ऐतिहासिक मटका मेला न केवल व्यापार का केंद्र है, बल्कि मेवाड़ की परंपराओं और संस्कृति को जीवित रखने का भी एक जरिया है. उदयपुर के लोग इसे अपनी आस्था और परंपरा से जोड़कर मनाते हैं, जिससे यह मेला हर साल और भी भव्य होता जा रहा है.

जहां शहरवासी अपनी जरूरत के हिसाब से सामानों की खरीदारी कर रहे हैं। बता दें कि मेवाड़ में दशामाता पर पुरानी मटकी हटाकर नई मटकी रखने की परंपरा है। गर्मी की शुरुआत में घरों में मटके बदले जाते हैं। मेले में रंगे-बिरंगे मटकों की जगह साधारण मेवाड़ी मटकों की डिमांड ज्यादा है। यह मटके गोगुंदा, फतहनगर, मावली एरिया से आए हैं। तालाबों की मिट्टी से बने होने के कारण इनका पानी ठंडा रहता है। इसके अलावा मेले में गुजरात के मोरबी और जैसलमेर से भी मटके मंगवाए गए हैं।

मेले में आनंद लेने और खरीदारी के लिए उदयपुर संभाग के विभिन्न इलाकों से हजारों लोग आते हैं। यह मेला सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि मेवाड़ की संस्कृति, परंपरा और धार्मिक मान्यताओं का भी प्रतीक है।
