श्री जगन्नाथ स्वामी के दरबार में ध्वजा महोत्सव: मंत्रोच्चार के बीच कगर की दुर्लभ लकड़ी से बने ध्वजदंड पर फहराई दिव्य गरुड़ ध्वजा, जयघोष से गूंजा जगदीश मंदिर
जगदीश मंदिर में शुक्रवार को आस्था, परंपरा और मेवाड़ की गौरवशाली संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। पूरे मेवाड़ के आराध्य भगवान जगन्नाथ स्वामी के धाम में करीब 374 वर्ष पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए मंदिर के 79 फीट ऊंचे शिखर पर नई गरुड़ ध्वजा चढ़ाई गई। ध्वजा परिवर्तन के इस विशेष आयोजन को देखने और दर्शन करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे।
यह ध्वजा केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि भगवान विष्णु के ‘गरुड़ ध्वज’ स्वरूप की आस्था का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वैशाख पूर्णिमा के पाटोत्सव के बाद ज्येष्ठ षष्ठी के अवसर पर हर वर्ष ध्वजा परिवर्तन की परंपरा निभाई जाती है। मंदिर की 32 सीढ़ियां चढ़कर जब भक्त शिखर की ओर देखते हैं तो यह ध्वजा उन्हें भगवान के संरक्षण और सनातन संस्कृति की अटूट परंपरा का बोध कराती है।

मंदिर की स्थापत्य कला जितनी भव्य है, उतनी ही विशेष इसके शिखर पर स्थापित ध्वजादंड की परंपरा भी है। जानकारों के अनुसार ध्वजादंड में ‘कगर’ नामक दुर्लभ लकड़ी का उपयोग किया जाता है, जो केवल मेवाड़ क्षेत्र की जरगा जी और सायरा की पहाड़ियों में प्राकृतिक रूप से पाई जाती है। इस लकड़ी की सबसे बड़ी विशेषता इसकी मजबूती और दीर्घायु है, जो विपरीत मौसम में भी लगभग सौ वर्षों तक सुरक्षित रहती है।
इतिहासकारों के अनुसार 13 मई 1652 को मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ ही ध्वजादंड स्थापित करने की परंपरा शुरू हुई थी। मंदिर प्रशासन और पुजारी परिषद के अनुसार (08/05/2026) शुक्रवार सुबह विशेष धार्मिक अनुष्ठानों के साथ आयोजन शुरू हुआ। पुजारी रामगोपाल, भावेश और लोकेश ने बताया कि भगवान जगन्नाथ स्वामी का पंचामृत अभिषेक कर विशेष श्रृंगार धारण कराया गया। मंदिर में हवन एवं पूर्णाहुति से पूर्व नौ नई ध्वजाएं ठाकुरजी के समक्ष अर्पित की गईं।

सुबह विधि-विधान के साथ पुरानी ध्वजा उतारकर नई मुख्य ध्वजा शिखर पर फहराई गई। इसके बाद मंदिर के गुंबद और परिक्रमा क्षेत्र में स्थित भगवान शिव, गणपति, सूर्य एवं दुर्गा माता के मंदिरों पर भी ध्वजाएं चढ़ाई गईं। इस दौरान श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला और मंदिर परिसर जयकारों से गूंज उठा।
‘मंगलम भगवान विष्णु, मंगलम गरुड़ ध्वज…’ विष्णु स्तुति के मंगलाचरण के कारण इस ध्वजा को ‘गरुड़ ध्वजा’ कहा जाता है। यह प्रभु के संरक्षण, आस्था और सनातन परंपरा की निरंतरता का प्रतीक मानी जाती है। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक आस्था को जीवंत बनाए हुए है।

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