उदयपुर की गवरी: मेवाड़ की 40 दिन चलने वाली अनोखी लोकपरंपरा, जानिए कहां और कैसे होती है

September 7, 2026 | desk | Cultural

उदयपुर और मेवाड़ की पहचान सिर्फ झीलों, महलों और किलों से नहीं है, बल्कि यहां की सदियों पुरानी लोकपरंपराओं से भी है। इन्हीं परंपराओं में एक खास नाम है—गवरी। गवरी को सिर्फ लोकनृत्य कहना सही नहीं होगा। यह लोकनाट्य, नृत्य, संगीत, अभिनय और धार्मिक आस्था का अनोखा संगम है। मेवाड़ के भील आदिवासी समुदाय की यह परंपरा आज भी उदयपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में जीवंत है।

कब शुरू होती है गवरी? गवरी की शुरुआत आमतौर पर रक्षाबंधन के अगले दिन से मानी जाती है। इसके बाद करीब 40 दिनों तक गवरी के अलग-अलग खेल और प्रस्तुतियां होती हैं। स्थानीय परंपराओं में रक्षाबंधन के बाद गवरी शुरू करने की प्रक्रिया को विशेष धार्मिक महत्व दिया जाता है। इन 40 दिनों के दौरान कलाकारों की टोलियां अलग-अलग गांवों में जाकर गवरी का मंचन करती हैं। यानी गवरी किसी एक जगह पर होने वाला कार्यक्रम नहीं है—पूरा गांव और आसपास का क्षेत्र ही इसका मंच बन जाता है।

उदयपुर में कहां-कहां होती है गवरी? गवरी मुख्य रूप से उदयपुर जिले के आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में देखने को मिलती है। उदयपुर के अलावा मेवाड़ के आसपास के क्षेत्रों में भी इसकी मजबूत परंपरा है। उदयपुर क्षेत्र में थूर, पहाड़ा, डबोक क्षेत्र का मेड़ता और मारुवास जैसे गांवों में गवरी के आयोजन और मंचन देखने को मिले हैं। इसके अलावा उदयपुर शहर के आसपास के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में भी अलग-अलग टोलियां गवरी लेकर पहुंचती हैं। इसकी खास बात यह है कि गवरी के लिए कोई बड़ा स्टेज या थिएटर जरूरी नहीं होता। गांव का चौक, खुला मैदान या बस्ती के बीच की जगह ही गवरी का रंगमंच बन जाती है।

गवरी में क्या होता है? गवरी में कलाकार अलग-अलग पात्रों का रूप धारण करते हैं और पौराणिक तथा लोककथाओं पर आधारित प्रसंगों को अभिनय और नृत्य के जरिए प्रस्तुत करते हैं। इसमें देवता, मनुष्य, राक्षस और पशु पात्र देखने को मिलते हैं। भगवान शिव, माता पार्वती, भैरव, राक्षसों और कई लोक पात्रों से जुड़े प्रसंगों को बेहद जीवंत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। गवरी के अलग-अलग खेलों में कान-गूजरी, लाखा बंजारा, गोमा मीणा, नटनी, कंजर-कंजरी, नाथू भाया, कालबेलिया और भियावड़ जैसे प्रसंग भी शामिल होते हैं।

गवरी में महिलाएं क्यों नहीं होतीं? गवरी की सबसे खास बातों में से एक है कि पारंपरिक गवरी मंडली में महिला पात्रों की भूमिका भी पुरुष कलाकार ही निभाते हैं पुरुष कलाकार महिलाओं के किरदारों का रूप धारण कर अभिनय करते हैं। इसी वजह से गवरी की वेशभूषा और मेकअप भी दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनता है।

ढोल-मांदल की थाप और रंग-बिरंगी वेशभूषा गवरी के दौरान ढोल, मांदल और थाली जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप सुनाई देती है। कलाकारों की ऊर्जा, तेज कदमताल और अभिनय पूरे माहौल को उत्सव में बदल देते हैं। कई पात्रों के लिए विशेष मुखौटे और पारंपरिक वेशभूषा का इस्तेमाल किया जाता है। यही वजह है कि गवरी की प्रस्तुति देखने में भी बेहद आकर्षक लगती है।

गवरी सिर्फ नृत्य नहीं, एक धार्मिक अनुष्ठान भी है गवरी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी धार्मिक आस्था है। यह परंपरा भगवान शिव और देवी पार्वती से जुड़ी मान्यताओं के साथ निभाई जाती है। गवरी करने वाले कलाकारों के लिए यह सिर्फ मंच पर प्रस्तुति देना नहीं, बल्कि एक तरह की साधना और अनुशासन भी माना जाता है। गवरी के 40 दिनों के दौरान कलाकार कई तरह के नियमों का पालन करते हैं। परंपरा के अनुसार कई कलाकार इस अवधि में नंगे पैर रहते हैं और खान-पान व दैनिक जीवन में संयम रखते हैं। कुछ परंपराओं में स्नान, बिस्तर, मांसाहार, शराब और हरी सब्जियों से दूरी जैसे कठोर नियमों का भी उल्लेख मिलता है।

क्यों खास है गवरी? गवरी की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसमें धर्म, लोककथा, मनोरंजन और सामाजिक संदेश एक साथ दिखाई देते हैं। कहीं देवी-देवताओं की कथा होती है, कहीं अच्छाई और बुराई के संघर्ष को दिखाया जाता है, तो कहीं हास्य और सामाजिक जीवन से जुड़े प्रसंग दर्शकों का मनोरंजन करते हैं। इस दौरान पूरा समुदाय किसी न किसी रूप में इससे जुड़ता है। कलाकार गांव-गांव जाते हैं और ग्रामीण अपने स्तर पर उनका स्वागत करते हैं। 40 दिनों बाद होता है समापन लगभग 40 दिनों तक चलने वाली इस परंपरा का अंतिम चरण भी धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ पूरा किया जाता है। कलाकार अपनी टोली के साथ वापस अपने गांव लौटते हैं और समापन की रस्में निभाई जाती हैं।

मेवाड़ की मिट्टी में आज भी जिंदा है गवरी आज के आधुनिक दौर में जब मनोरंजन के इतने साधन मौजूद हैं, उसके बावजूद उदयपुर और मेवाड़ के आदिवासी इलाकों में गवरी की परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है। गवरी सिर्फ एक लोकनृत्य नहीं है। यह मेवाड़ की आदिवासी संस्कृति, आस्था, लोककथाओं और सामुदायिक जीवन की 40 दिन चलने वाली जीवंत तस्वीर है। अगर उदयपुर को सिर्फ झीलों और महलों से अलग उसकी असली लोकसंस्कृति के रूप में देखना है, तो गवरी को करीब से देखना मेवाड़ को समझने का एक अनोखा अनुभव हो सकता है।