बछ बारस क्यों मनाई जाती है? जानिए इसके पीछे की कहानी और इस दिन क्या-क्या होता है

September 8, 2026 | desk | Cultural

बछ बारस, जिसे गोवत्स द्वादशी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में गाय और उसके बछड़े को समर्पित एक महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन विशेष रूप से गाय और बछड़े की पूजा की जाती है। राजस्थान समेत कई राज्यों में महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं और अपने परिवार तथा संतान की सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना करती हैं।

बछ बारस क्यों मनाई जाती है?

बछ बारस मनाने के पीछे गाय और बछड़े के प्रति सम्मान, ममता और कृतज्ञता की भावना जुड़ी हुई है। भारतीय संस्कृति में गाय को लंबे समय से पूजनीय माना गया है। वहीं भगवान श्रीकृष्ण के बाल जीवन का संबंध भी गायों और ग्वाल-बालों से रहा है।

इस दिन गाय और उसके बछड़े की पूजा कर परिवार की संतान की खुशहाली और स्वास्थ्य की प्रार्थना की जाती है। ग्रामीण और कृषि प्रधान समाज में गाय का आर्थिक और सामाजिक महत्व भी बहुत अधिक रहा है। इसलिए इस पर्व का संबंध धार्मिक आस्था के साथ-साथ भारतीय पशुपालन और ग्रामीण जीवन से भी माना जाता है।

बछ बारस की प्रचलित कथा क्या है?

बछ बारस से जुड़ी एक लोककथा काफी प्रचलित है।

कहा जाता है कि एक साहूकार के घर में गाय और उसका बछड़ा था। एक दिन साहूकार के घर की बहू से अनजाने में बछड़े की मृत्यु हो गई। इस घटना से वह बहुत दुखी हुई और उसे अपनी गलती का पश्चाताप होने लगा।

जब बछ बारस का दिन आया तो उसने पूरे मन से गाय और बछड़े की पूजा की और अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। उसने श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रार्थना की कि उसकी सच्ची भक्ति से बछड़े को जीवन मिल जाए।

लोकमान्यता के अनुसार, उसकी प्रार्थना और श्रद्धा से बछड़ा दोबारा जीवित हो गया।

इसके बाद से बछ बारस के दिन गाय और उसके बछड़े की पूजा करने की परंपरा को विशेष महत्व मिलने लगा। हालांकि इस कथा के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूप भी सुनने को मिलते हैं।

बछ बारस के दिन क्या-क्या किया जाता है?

इस दिन सुबह महिलाएं स्नान करके व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद गाय और उसके बछड़े को स्नान कराया जाता है और उन्हें सजाया जाता है।

पूजा के दौरान—

  • गाय और बछड़े को तिलक लगाया जाता है।
  • उनकी पूजा और आरती की जाती है।
  • गाय को हरा चारा, गुड़ और अन्य पारंपरिक खाद्य पदार्थ खिलाए जाते हैं।
  • परिवार की संतान के सुख, स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना की जाती है।
  • महिलाएं बछ बारस की कथा सुनती और सुनाती हैं।
  • कई स्थानों पर महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा करती हैं।

इस दिन खान-पान की क्या परंपरा है?

बछ बारस के दिन खान-पान को लेकर भी अलग-अलग क्षेत्रों में विशेष परंपराएं हैं। राजस्थान में कई परिवारों में इस दिन गेहूं और कुछ विशेष अनाज का सेवन नहीं किया जाता।

कई जगह महिलाएं गाय के दूध और उससे बने पदार्थों का सेवन भी नहीं करतीं। इसके पीछे यह भावना मानी जाती है कि इस दिन गाय का दूध उसके बछड़े के लिए रहने दिया जाए।

हालांकि खान-पान की परंपराएं क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।

बछ बारस का संदेश

बछ बारस केवल एक धार्मिक व्रत या पूजा का दिन नहीं है। यह पर्व मां और संतान के रिश्ते, पशु-प्रेम, करुणा और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश भी देता है।

गाय और बछड़े की पूजा के माध्यम से भारतीय परंपरा में पशुओं के प्रति संवेदनशीलता और उनके महत्व को याद किया जाता है।

इसी वजह से बछ बारस आज भी राजस्थान सहित कई क्षेत्रों में श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाई जाती है।